Thursday, August 11, 2016

यही सत्ता का उन्माद है यहां.

कहने को हम आजाद हैं यहां.
पर कितने ही बरबाद हैं यहां.

अपनी ढ़पली अपना राग है.
सब बहुत बडे़ उस्ताद हैं यहां.

शांतिसेवको में फैली अशांति.
होते रोज नये फसाद हैं यहां.

ज़िंदगी कैसे भी शेर सुनाये.
सभी कहते इरशाद हैं यहां.

गालियां है राजनैतिक गहना
यही सत्ता का उन्माद है यहां.

खून का दरिया बहा रहे सब.
तबभी देश जिंदाबाद है यहां.

जुर्म और जुल्म की हवा चली.
इंशा जिंदा औ आबाद है यहां.

Sunday, July 17, 2016

बेटियां


खुशियों का एक जहान होती है बेटियां.
शुभलाभ  का निशान होती है बेटियां.

संस्कार और रीति रिवाजों को समेटे
अपने पिता की पहचान होती है बेटियां.

गमों को छिपा खुशियों  को बांटती
इन लबों की मुस्कान होती है बेटियां.

बेटा छोडता मां बाप को वृद्धाश्रम
उनके गमों में कुर्बान होती हैं बेटियां

बेटे चले जा रहे गर्त में हर रोज
हौसलों की एक उडान होती है बेटियां

कभी रानी,कभी लाडो,कभी लक्ष्मी अयान
सदा ही भाग्यवान होती है बेटियां.

Tuesday, June 21, 2016

पत्थरों में हीरे की तलाश करता रहा.

पत्थरों में हीरे की तलाश करता रहा.
असंभव था पर मै प्रयास करता रहा.
संघर्ष की बलि चढ़ गया इस आश से
कोशिश से ये देश विकास करता रहा.
मै उसे उम्मीद की राह बताता रह गया
वो था कि हर कदम निराश करता रहा.
बदलाव की हर उम्मीद खत्म हो चलीं
मेरा हौसला पल पल हताश करता रहा.
सूरज ने समझौते कर लिया अंधियारे से
और मै ही चिरागों से प्रकाश करता रहा.
विरासत सम्हाल कर रखी जो वरषों से
इंसान खुद के हाथों विनाश करता रहा.

Monday, April 25, 2016

धधकती सी मशालें हो गये.

निकल कर हवाले हो गये.
बस ठंड़ के दुशाले हो गये.

दर्द के आसरे ही हम रहे
दो जून के निवाले हो गये.

आग ऐसी लगी इस तन मे
धधकती सी मशालें हो गये.

काम कुछ हमने ऐसे किये.
आजन्म घर निकाले हो गये.

मंज़िलों तब मिली कदमों को.
तलवों में जो कई छाले हो गये.

दिल-हवेली शान से रोशन हुई
इसकी दीवारो मे जाले हो गये.

जिस जगह कभी था एक घर.
अब मकान आठमाले हो गये.

असहिष्णु जब से देश यह बना.
बदनाम मस्जिदें शिवाले हो गये.

ठगे हुये सभी गांव मिले.

किससे कितने घाव मिले.
कितने इनको भाव मिले.

नये नये लोग मिले जब.
रोज रोज मुझे ताव मिले.

राह नयी चलते - चलते
थके थके मेरे पांव मिले.

शहरो की राजनीति मे.
ठगे हुये सभी गांव मिले.

देश हुआ शतरंजी खेल.
संसद मे बस दांव मिले.

पेड़ो की सुनो कहानी
किस्सों मे ही छांव मिले.

मतवालों की चाल न पूंछ.

दिलवालों का हाल न पूंछ.
मतवालों की चाल न पूंछ.

गीदड़ ऐसे दिख जायेंगे.
ओढे शेर की खाल न पूंछ.

सत्ता के गलियारे मे कैसे.
हजम हुआ है माल न पूंछ.

नेताओ का सम्मान यही.
क्यों बजते है गाल न पूंछ.

नैतिकता गिरवी है कैसे.
बुना है कैसे जाल न पूंछ.

अच्छे दिन के वादे संग.
कैसे गुजरा साल न पूंछ.

पानीदारी खारी हो गई.
क्यों न गलती दाल न पूंछ.

मै तुमको तम से रिहाई दिला दूंगा..

तुम उजालों में खुशियां मनाते रहो.
मै तुमको तम से रिहाई दिला दूंगा..

गर मोहलत मिली इस जंग से मुझे
मै तुमको भी अपने से मिला दूंगा.

उजालों को विरासत बनाकर रखो
मै सफलता का अमिय पिला दूंगा.

तुम वफादारी से आगे बढ़ते रहो.
इस सफर का तुमको सिला दूंगा.

हार से सीख लेकर कोशिश करो.
हार की जड़ को मै भी हिला दूंगा.

तुम इस गुंचे चमन के वारिस बनों
मै गुलिस्तां मे एक गुल खिला दूंगा.

है वैचारिक संभोग यहां.

कैसे कैसे हैं रोग यहां
मनुज रहा हैं भोग यहां.

बस कहने की बातें हैं
भिड़ते रहते जोग यहां.

कथनी करनी मे अंतर
पेशेवर लंपट लोग यहां.

विचार हुये गोल मटोल
है वैचारिक संभोग यहां.

राजनीति करने लगे वो
जो करते हैं योग यहां.

जिस्मफरोशी के धंधे मे
हैं सरकारी उद्योग यहां.

कर संतोष भला हो तेरा
मत कर नये प्रयोग यहां.

gazal

कब तक भर पायेगी खाई, निर्धन और धनवान की।
अब तो बोली लगती यारो, होठों की मुस्कान की।

वीरों का बलिदान भुलाकर, नेता बैठे शान से,
गिरवी है संसद में पूंजी, वीरों के बलिदान की।

समरसता का ज्ञान मिलेगा, हिन्दी के संसार में,
करें अगर चर्चा हिंदी में, मीरा और रसखान की।

नित कर्तव्य करो अपना, पर फल की इच्छा मत करना,
ज्ञान सतत देती है गीता, आयत भी कुरआन की।

खाये और अघाये ना जानें, पीडा खाली पेट की,
मानव धर्म भुला करके, वे बातें करते ज्ञान की।

लडके और लडकी का अंतर, पल में होता दूर है,
खूबी बहुत बडी होती है, पश्चिम के परिधान की।